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Anshu Gupta
Founder, Goonj — The Clothing Man of India
"Not trash, this is someone's dignity — the urban surplus, rural India's self-respect."
story
1990 के दशक की बात है। दिल्ली की कड़कड़ाती ठंड में जब लोग अपने घरों में रज़ाइयों में दुबके थे, तब एक युवा पत्रकार अंशू गुप्ता की मुलाकात हबीब नाम के एक व्यक्ति से हुई। हबीब का काम लावारिस शवों को उठाना था। बातचीत के दौरान हबीब ने एक ऐसी बात कही: "गर्मियों में जब शव मिलता है तो मुझे कोई दिक्कत नहीं होती, लेकिन सर्दियों में मुझे रोज़ दो से तीन शव उठाने पड़ते हैं। लोग ठंड से नहीं मरते... लोग ठंड में कपड़ों के अभाव से मरते हैं।"
इस एक घटना ने अंशू गुप्ता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि जहाँ शहरों में अलमारियाँ पुराने कपड़ों से भरी पड़ी हैं, वहीं देश का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ एक कपड़े के टुकड़े के अभाव में अपनी जान गंवा देता है।
इसी सोच के साथ 1999 में अपनी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर, उन्होंने दिल्ली में अपने ही घर से मात्र 67 कपड़ों के साथ अपनी संस्था का नाम 'गूंज' रखा।
अंशू जी का स्पष्ट मानना था कि किसी भी गरीब इंसान को मुफ्त में सामान देना उसकी लाचारी का मज़ाक उड़ाना है। इसलिए उन्होंने 'Cloth for Work' (काम के बदले कपड़ा) का अनोखा मॉडल तैयार किया।
ग्रामीण भारत में महिलाओं के लिए मासिक धर्म के समय स्वच्छता की कमी एक भयंकर समस्या थी। इसके लिए उन्होंने 'Not Just a Piece of Cloth' अभियान शुरू किया।
2015 में मनीला, फिलीपींस में अंशू गुप्ता को एशिया के सर्वोच्च सम्मान — रमन मैग्सेसे पुरस्कार — से सम्मानित किया गया।
philosophy
कपड़ा दान नहीं — यह एक बुनियादी ज़रूरत है। जब हम शहरी अतिरिक्त को ग्रामीण ज़रूरत मानते हैं, और इसे मुफ्त देने की बजाय सामुदायिक श्रम के बदले देते हैं — तो हम दाता नहीं, बल्कि साझेदार बन जाते हैं।